भगवान शिव के अनुसार यदि बाहरी संसार को न देखें तो क्या होगा?
मानव जीवन अनगिनत अनुभवों से गुज़रता है। हम हर पल कुछ न कुछ देखते, सुनते और महसूस करते रहते हैं। हमारी इंद्रियाँ हमें बाहरी संसार से जोड़ती हैं, और यही संसार हमें मोह, आकर्षण और इच्छाओं की ओर खींचता है। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि यदि हम बाहरी संसार को न देखें, केवल अपने भीतर झाँकें, तो क्या होगा? इस प्रश्न का उत्तर भगवान शिव के सिद्धांतों में मिलता है।
भगवान शिव, जिन्हें योगेश्वर और महादेव कहा जाता है, सदैव आंतरिक यात्रा पर ज़ोर देते हैं। वे कहते हैं कि मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह बाहर खोजता है जो वास्तव में भीतर मौजूद है। यदि साधक बाहरी संसार को देखने से हटकर भीतर की ओर देखना शुरू कर दे, तो उसका जीवन पूरी तरह बदल सकता है। आइए विस्तार से समझें।
1. बाहरी संसार – माया का जाल
भगवान शिव मानते हैं कि यह संसार केवल एक माया है।
यहाँ सुख-दुख अस्थायी हैं।
लाभ-हानि पल भर में बदल जाते हैं।
सुंदरता और कुरूपता समय के साथ नष्ट हो जाते हैं।
जब हम बाहरी वस्तुओं को देखते हैं तो हम उनसे आसक्त हो जाते हैं। यह आसक्ति ही हमारे दुःख की जड़ है। यदि हम बाहरी संसार को देखना बंद कर दें, तो मोह-माया का यह जाल धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है।
2. आत्मज्ञान की राह
भगवान शिव ने ध्यान और समाधि को आत्मज्ञान का सर्वोच्च साधन बताया।
जब हम बाहरी दृश्य और आकर्षणों से ध्यान हटाकर भीतर देखते हैं, तो हमें अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव होता है।
बाहरी संसार क्षणिक है,
आत्मा सनातन है।
यदि मनुष्य भीतर देखना शुरू कर दे, तो उसे यह स्पष्ट समझ आ जाता है कि वह शरीर या विचार नहीं है, बल्कि शुद्ध चेतना है। यही आत्मज्ञान है, और यही मोक्ष की पहली सीढ़ी।
3. मन की शांति और स्थिरता
आज का मनुष्य मानसिक अशांति से ग्रसित है। कारण यही है कि वह बाहर की चीज़ों को देखने और पाने की दौड़ में लगा रहता है।
कोई सुंदर वस्तु दिखे तो उसे पाने की चाह।
कोई दुखद दृश्य दिखे तो मन व्याकुल हो जाता है।
किसी की सफलता दिखे तो ईर्ष्या जगती है।
लेकिन जब हम बाहरी संसार को न देखकर भीतर का चिंतन करते हैं, तो मन शांत हो जाता है। भीतर जाने से हमें स्थिरता मिलती है, और यही शिव का सच्चा उपदेश है।
4. समत्व भाव का विकास
बाहरी संसार को न देखने का अर्थ यह नहीं कि आँखें मूँद लेना, बल्कि उसके प्रभाव से ऊपर उठना है।
जब साधक बाहर के सुख-दुख से प्रभावित नहीं होता, तभी उसके भीतर समत्व भाव उत्पन्न होता है।
भगवान शिव कहते हैं कि सच्चा योगी वही है, जो मान-अपमान, जय-पराजय, लाभ-हानि को समान दृष्टि से देख सके। यह तभी संभव है जब मनुष्य बाहरी संसार की ओर आकर्षित न होकर अपने भीतर टिके।
5. आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव
बाहरी संसार हमारी ऊर्जा को बिखेर देता है।
इंद्रियाँ लगातार इधर-उधर दौड़ती रहती हैं।
मन अनावश्यक विचारों में उलझा रहता है।
यदि साधक बाहरी संसार को देखना बंद कर दे और ध्यान भीतर लगाए, तो सारी ऊर्जा एकत्रित हो जाती है। इस ऊर्जा से उसे दिव्य अनुभव होते हैं। शिव के ध्यान मार्ग में यही कहा गया है कि प्राण और चित्त को भीतर समेटो, वहीं सत्य है।
6. सच्चा आनंद और मुक्ति
बाहरी सुख कभी भी स्थायी नहीं हो सकते। एक वस्तु मिलते ही दूसरी की चाह पैदा हो जाती है। यह अंतहीन दौड़ है।
लेकिन जब साधक भीतर जाता है, तो उसे आत्मानंद का अनुभव होता है। यह आनंद स्थायी है, इसे कोई छीन नहीं सकता।
भगवान शिव के अनुसार, जब मनुष्य बाहरी संसार को देखना बंद कर देता है, तो उसका मिलन परम तत्त्व से हो जाता है। यही मोक्ष है, यही परम मुक्ति।
7. व्यवहारिक जीवन में लाभ
हो सकता है कोई यह सोचे कि यदि हम बाहरी संसार न देखें, तो क्या जीवन रुक नहीं जाएगा? इसका उत्तर है – नहीं।
शिव के अनुसार इसका अर्थ है कि हम संसार में रहें, अपने कर्तव्य निभाएँ, लेकिन भीतर से अलग और स्वतंत्र रहें।
जैसे कमल का फूल पानी में रहकर भी पानी से अछूता रहता है।
वैसे ही मनुष्य संसार में रहकर भी उसके प्रभाव से अछूता रह सकता है।
यदि साधक ऐसा कर पाए तो उसका जीवन अधिक शांत, संतुलित और सार्थक हो जाता है।
8. आधुनिक संदर्भ में शिव का संदेश
आज के समय में लोग सोशल मीडिया, विज्ञापनों और भौतिक आकर्षणों में फँसकर असंतुलित हो रहे हैं।
हर समय तुलना, प्रतिस्पर्धा और असंतोष बना रहता है।
भगवान शिव का यह संदेश पहले से भी अधिक प्रासंगिक है –
"बाहर मत भागो, भीतर देखो।"
यदि हम इस सिद्धांत को अपनाएँ, तो मानसिक रोग, तनाव और चिंता स्वतः कम हो जाएँगे।
निष्कर्ष
भगवान शिव के अनुसार यदि हम बाहरी संसार को न देखें और भीतर की ओर देखें, तो हमें—
मोह-माया से मुक्ति,
आत्मज्ञान,
शांति और स्थिरता,
समत्व भाव,
आध्यात्मिक ऊर्जा,
और अंततः मुक्ति प्राप्त होती है।
यह बाहरी संसार अस्थायी है, परंतु आत्मा शाश्वत है। बाहरी दृश्य केवल इंद्रियों को भटकाते हैं, लेकिन भीतर देखने से आत्मा का साक्षात्कार होता है। शिव यही सिखाते हैं कि सच्चा आनंद बाहर नहीं, बल्कि भीतर है।

0 टिप्पणियाँ